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India

एनीमिया के आंकड़े जुटाने की चुनौती: नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के बीच डेटा का अभाव

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Last updated: October 27, 2026 6:17 pm
Vishal K. Singh - Editor
21 hours ago
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भारत में एनीमिया के आंकड़ों और स्वास्थ्य सर्वेक्षण को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्रण
सार्वजनिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण और डेटा संग्रहण को दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र।
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देश में एनीमिया की स्थिति का आकलन करने को लेकर गंभीर चुनौतियां सामने आ रही हैं, क्योंकि नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-6 के इस वर्ष जारी तथ्य पत्रों में एनीमिया से जुड़ा खंड शामिल नहीं किया गया है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध के बाद यह पहली बार है कि किसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण में एनीमिया के अनुमानों को जगह नहीं मिली है। पूर्व के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्यों में महिलाओं के बीच यह समस्या बेहद गंभीर रही थी, जहां NFHS-5 (2019-21) के आंकड़ों के मुताबिक 15 से 49 वर्ष की आयु की लगभग 71.4 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित थीं।

Contents
डेटा के अभाव में नीतिगत समीक्षा की कठिनाईजैविक कारणों से परे सामाजिक और लैंगिक पहलूSAMPADA सर्वेक्षण और नए कार्यक्रमों की स्थिति

डेटा के अभाव में नीतिगत समीक्षा की कठिनाई

पूर्व के आंकड़ों में यह स्पष्ट हुआ था कि प्रजनन आयु की महिलाओं के साथ-साथ बच्चों और किशोरियों में भी यह समस्या व्यापक रूप से फैली हुई थी। राष्ट्रीय स्तर पर 2015 से 2016 के बीच प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया का स्तर 53 प्रतिशत से बढ़कर 57 प्रतिशत हो गया था। पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा लगभग 9 प्रतिशत बढ़ा था, जबकि 6 महीने से 5 वर्ष के बच्चों के लिए यह 54 प्रतिशत से बढ़कर 69 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इसके अलावा, देश भर में 59.1 प्रतिशत किशोरियां और 31.1 प्रतिशत किशोर इस समस्या से प्रभावित पाए गए थे। हालांकि, पारंपरिक रूप से इसे केवल जैविक कारणों से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे महिलाओं के पास समय की कमी, भोजन करने के पैटर्न, सामाजिक मानदंड और वित्तीय निर्भरता जैसे सामाजिक और लैंगिक कारक भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

जैविक कारणों से परे सामाजिक और लैंगिक पहलू

इस सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए सरकार ने इस वर्ष एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम को पुनर्गठित किया है। जून महीने में पुरानी 6x6x6 व्यवस्था को बदलकर 7x7x7 योजना लागू की गई है, जिसमें परीक्षण और उपचार, डिजिटल ‘T4’ ट्रैकिंग प्रणाली और एक नया राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र शामिल किया गया है। सरकारी स्तर पर यह तर्क दिया गया है कि उंगली के पोर से लिए जाने वाले रक्त नमूनों के आंकड़े पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माने जाते थे और वे आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सकते थे, तथा भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों का पालन कर रहा था जो स्थानीय संदर्भ के अनुकूल नहीं हो सकते हैं।

इन चिंताओं के समाधान के रूप में सरकार ने शिराओं से रक्त के नमूने लेने की बात कही और इसके लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय पोषण संस्थान के नेतृत्व में आहार और बायोमार्कर सर्वेक्षण यानी SAMPADA सर्वेक्षण शुरू किया, जिसे दिसंबर 2022 में लॉन्च किया गया था। इस सर्वेक्षण के तहत 183 जिलों के निवासियों से शिराओं के रक्त नमूने एकत्र किए गए और नवंबर 2025 तक सर्वेक्षण पूरा हो चुका है।

SAMPADA सर्वेक्षण और नए कार्यक्रमों की स्थिति

समस्या यह है कि नवंबर 2025 में सर्वेक्षण पूरा होने के बावजूद SAMPADA के परिणाम अभी तक जारी नहीं किए गए हैं। जब तक ये आंकड़े सार्वजनिक नहीं होते, तब तक देश के पास नए कार्यक्रम के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए कोई अद्यतन राष्ट्रीय या राज्य-स्तरीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को एक निश्चित तिथि पर SAMPADA के निष्कर्षों को लिंग, आयु और राज्यवार विभाजित करके जारी करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उपयोग की गई पद्धतियां एनएफएचएस के समान हों ताकि पुराने आंकड़ों से तुलना की जा सके। साथ ही, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम को लिंग के आधार पर नियमित रूप से डेटा प्रदान करना चाहिए और परामर्श गतिविधियों में पूरे परिवार को शामिल किया जाना चाहिए।

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ByVishal K. Singh
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Vishal Singh is the Editor-in-Chief of Future Post News. He leads the newsroom with a focus on accurate, timely, and unbiased reporting across national, regional, technology, business, sports, and public affairs. He oversees editorial standards, fact-checking, and content quality to ensure readers receive reliable and trustworthy news.
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